रणबीर कपूर का सशक्त अभिनय और अनुराग के अभिनव प्रयोग से सजी शानदार फिल्म "बर्फी"..देखकर अभिभूत हो गए और एक पंक्ति आप सब के लिए " प्यार ज़िन्दगी में एक बार आपके दरवाजे पर दस्तक जरूर देता है लेकिन अगर आपने देर कर दी तो फिर ज़िन्दगी भर आप उस दस्तक के एहसास के सहारे जीते है . ज़िन्दगी में rewind का button नहीं है दोस्तों। जो है आज है उसे जी लो कल का पता नहीं तो जो आपके करीब है या जिनके आप करीब है उन्हें दूर न जाने दे।" बर्फी की टीम को बधाई।
Saturday, September 15, 2012
Friday, September 7, 2012
Saturday, May 26, 2012
Wednesday, March 28, 2012
हिसाब किताब
मेरी दुआ है ऊपर वाले से , दे तुम्हे एक गुदगुदी जो ले आए होठो पर तुम्हारे हँसी, जो शायद खो गयी है भीड़ में कही. दे चाँद की रोशनी तुम्हारी आँखों में जिनसे वो चमक उठे और देखने लगो तुम सपने नए फिर से. कोई गीत गुनगुना दे तुम्हारे कानो में जिससे झूम उठे दिल तुम्हारा. छीन ले तुमसे तुम्हारी स्मिरीती जो अतीत के पलो को खीच लाती है वर्तमान में जिनसे तुम दुखी हो जाते हो . और आखिरी में भर दे सुकून से तुम्हारा दिल ताकि सो सको तुम चैन से बिना हिसाब किताब किये की क्या खोया क्या पाया.
किसी अपने के लिए जो जिंदगी से उदास है
और ऊपर वाले से नाराज़ है .
किसी अपने के लिए जो जिंदगी से उदास है
और ऊपर वाले से नाराज़ है .
Wednesday, January 25, 2012
गणतंत्र दिवस की बधाई
आप सभी को गणतंत्र दिवस की बधाई .....भाई १५ अगस्त २६ जनवरी और क्रिकेट मैच इसी दिन हमारा देशप्रेम कुछ ज्यादा परवान चढ़ता है . भारतवासी होने के नाते सविंधान ने मुझे भी स्वतंत्रता दे रखी है अपने विचार व्यक्त करने के लिए तो भैया हम हो गए शुरू ......वैसे किसी ने सही लिखा है कि "कुछ तो बात है हम में कि हस्ती मिटती नहीं हमारी " कुछ तो बात है कि भ्रष्टाचार के नए नए रिकॉर्ड बनाने वाले लोग आज भी अपनी कुर्सी पर बैठे बैठे मुस्कुरा रहे है और हमारे देश कि अस्सी प्रतिशत आम जनता किसी अवतार के अवतरण के इंतज़ार मई आस लगाए हुए है . कभी कभी कोई क्रांतिकारी विचार जुगनू कि भाँती चमक उठता है और हम उसे सूरज समझ लेते है और खुश हो जाते है कि अब सवेरा होने को है . पर जुगनू कि तरह ही वो रोशनी भी लुप्त हो जाती है . कोई भ्रष्टाचार के बड़े बड़े आंकड़े के मुद्दे उठाता है और हम खुश हो जाते है अब तो परिवर्तन आएगा पर समय के चक्के में वो मुद्दा भी धुल कि तरह उड़ जाता है . पहले लोग आंकड़े भूलते है , जो कि अरबो करोडो में होते है फिर मुद्दे . अब क्या करे भैया उन्हें भी तो बाल बच्चे पालने है और अगर वो भी इन बातो में अटक कर रह गए तो फिर देश का सकल घरेलु उत्पाद का क्या होगा जिसे बढाने के लिए ये अस्सी प्रतिशत लोग दिन रात मेहनत करते है. मुझे तो इतने अरबो रुपये कि संपत्ति और घोटालो कि बात सुनकर या पढ़ कर बड़ी ख़ुशी होती है भाई आखिर हमारे देश में इतना पैसा तो है ...अब ये बात अलग है कि इसी देश में लोग भूख से मर जाते है. ये तो हुए अस्सी प्रतिशत जनता की बात बाकी बचे २० में से १० प्रतिशत वो जो बोलने में कम करने में ज्यादा विश्वास रखते है और अपने तरीके से विरोध प्रदर्शन करते है.बचे १० में से ५ प्रतिशत हम जैसे लोग जो खुद तो कुछ नहीं करते बस राख में से अंगारे ढूँढते रहते है और आखिर के ५ प्रतिशत वो जिनके तो मजे है वो जिनके महलों में कभी अँधेरा नहीं होता क्योकि उजाले पर उन्होंने हक जमा रखा है . जिनके होठो पर भूख , गरीबी जैसे शब्द तो होते है पर उनका अर्थ या मर्म समझने का दिल नहीं , जो आज झंडा वंदन कर जन गण मन गायेंगे तो जरुर पर निभायेंगे नहीं ..........चलिए हम भी गणतंत्र दिवस मानते है भाई सरकार ने एक दिन की छुट्टी जो दे रखी है......और अंत में अगर आपको बात कड़वी लगी है तो आपके लिए है बूंदी के लड्डू जो जन गण मन के बाद बटने वाले है.
Sunday, December 18, 2011
उसका नाम मद्रास क्यों है?
अक्सर गेहू पिसवाने की दूकान (आटा चक्की ) पर वो सावला दुबला पतला सा लड़का मुझे दिख जाता था. मेहनत करते हुए कभी अनाज की बोरिया उठाते हुए तो कभी आटा चक्की से आटा निकालते हुए . आटा चक्की वाले काका उसे आवाज लगते "ऐ मद्रास जल्दी कर " मद्रास उसका ये नाम मेरे लिए आश्चर्य का विषय था . एक दिन मैंने हिम्मत कर के उससे पूछ ही लिया " छोटू तुम्हारा नाम क्या है ?" उसने प्रश्नभरी निगाह से देखते हुए उत्तर दिया "मद्रास". मैंने प्यार से फिर पुछा छोटू तुम्हारा असली नाम क्या है ?" उसने वही उत्तर थोड़ी उदासी के साथ दिया "मद्रास". मद्रास ये कैसा नाम रखा भाई तुम्हारे मम्मी पापा ने? उसने रुआंसी आँखों से मेरी तरफ देखा और बोला भैया ये नाम मेरे माँ बाप ने नहीं रखा है ये नाम मुझे बाजार ने दिया है , जिनके माँ बाप नहीं होते है न भैया दुनिया उन्हें ऐसे ही नाम दे देती है . और एक बड़ा भारी बोरा वो सर पर उठा कर चल दिया........
Wednesday, November 16, 2011
उन्मुक्त
अल्फाजो से एहसासों को बया कर पाना अब मुश्किल है
दुनियादारी में खुद को उलझा पाना अब मुश्किल है
इस पीर का मजा एक पीर ही जाने
रोशनी को अंधेरो से दबा पाना अब मुश्किल है
दुनियादारी में खुद को उलझा पाना अब मुश्किल है
इस पीर का मजा एक पीर ही जाने
रोशनी को अंधेरो से दबा पाना अब मुश्किल है
Subscribe to:
Posts (Atom)