Saturday, September 12, 2015


कभी कभी कुछ ऐसे ही सीधे सीधे मन की किताब से फेसबुक तक















Sunday, April 26, 2015

अरे जरा सुनो




कभी कभी तुम (आप लिखने का मन नहीं किया) मुझे किसी स्कूल की नर्सरी की टीचर सी लगती हो. जिसकी क्लास में ये नन्हे नन्हे , रंग बिरंगे शब्द दिन भर धमा चोकड़ी मचाते रहते है. तुम भी दिन भर इन्हें अपनी मनमानी करने देती हो पर दिन ख़त्म होने के पहले टेबल के नीचे से तुम निकाल लेती हो एक छड़ी और झूठ मूठ का गुस्सा दिखाते हुए इन शब्दों को बोलती हो "चलो बैठो एक लाइन में नहीं तो पिटाई कर देंगे तुम्हारी" ये मासूम जानते है की तुम इनकी पिटाई कर ही नहीं सकती फिर भी तुम्हारे झूठ मूठ के गुस्से के पीछे छिपे प्यार की खातिर ये नन्हे शैतान एक कतार में बैठ कर गाने लगते है कोई प्रार्थना जिसके सारे बोल भी इन्हें नहीं पता/ उसमे से भी कुछ मस्तीखोर एक आँख खोल कर आसपास का मुआइना  करने लगते है. तुम उस प्रार्थना की धुन में रच देती हो कोई नया गीत , कहानी या कविता इन  शब्दों की मासूमियत  बरकरार रखते हुए. तुम्हारे लिखे ये मस्तीखोर कुछ कुछ तुम्हारे जैसे ही है शायद. इन मासूम शब्दों को हज़ार दुआए.

Saturday, February 8, 2014

हथेलियाँ

कुछ शहर अलग कुछ डगर अलग
कुछ रीति अलग कुछ रिवाज़ अलग
कुछ गलिया अलग कुछ मोहल्ले अलग
कुछ तौर अलग कुछ तरीके अलग’
पर एक चीज़ हमेशा एक सी हर जगह’
मंदिर के अन्दर लम्बवत और मंदिर के बाहर क्षेतीज हथेलियाँ !


Tuesday, January 14, 2014

अब तो बंद भी कर दो रेत पर मेरा नाम लिखना

अब तो बंद भी कर दो रेत पर मेरा नाम लिखना. तुम सोचती हो लहरे आकर मिटा ही तो देगी कुछ देर बाद. लेकिन ऐसा नहीं है वो लहरे अपने साथ ले जाती है मेरे नाम की छाप और बन कर बादल जब बरसती है मेरे शहर में तो हर एक बूँद से तुम मेरा नाम पुकारती सुनाई देती हो. मै पागल सा हो जाता हु अक्सर ऐसी बारिशो में. इसलिए कहता हु अब तो बंद भी कर दो रेत पर मेरा नाम लिखना. 

Saturday, June 15, 2013

पिता


आवाज पिता की भी रही होगी कोमल कभी
पर समय के साथ  न जाने कितनी बार
रह गए होंगे शब्द अटके रुंधे गले के भीतर कही.
शब्द वात्सल्य के आ न पाए होंगे कंठ से बाहर न जाने कितनी बार.
और इन्ही शब्दों के बार बार अंतर घर्षण से पिता की आवाज होती
गई होगी कठोर कठोर समय के साथ .

चेहरा पिता का भी रहा होगा मासूम कभी
पर शायद बचपन छोटा कर दिया होगा जिम्मेदारियों ने
और तरुणाई छु कर भाग गई होगी कभी.
संसार ने दे दी होगी अनुभव की खरोंचे पिता के चहरे पर
और पिता का चेहरा होता गया होगा प्रोढ़ प्रोढ़ समय के साथ.

हथेलिया पिता की भी नर्म रही होगी कभी
जब उठाए होंगे हथोड़े और औजार उन्होंने
उन नर्म हथेलियों पर पड़ गए होंगे फफोले
जिनके जीवाश्म आज भी मौजूद है
पिता भी जान न पाए होंगे की कब हथेलिया बदल गई होंगी

कपास से रेगमाल में समय के साथ. 

हक़

उसकी हथेलियों पर मेरी ही हथेलियों का हक था

ये तो दुनिया थी जिसे मेरी किस्मत पर शक था 

Wednesday, May 8, 2013

संयोग


अजीब सा संयोग था उसे पढ़ना कुछ ख़ास अच्छा नहीं लगता था . थोडा बहुत कभी कभार पढ़ लेती थी. और मै था की लिखना मेरे लिए सांस लेने जैसा था. अगर कुछ मन के भीतर चल रहा हो और न लिख पाऊ तो ऐसी तकलीफ होती थी जैसे किसी अस्थमा के रोगी को सांस न लेने पर होती होगी. हां पर एक बात थी उसे सुनना बहुत अच्छा लगता था . दार्शनिक अंदाज में कहती थी” “लिखे हुए शब्द मुझे मृत लगते है जैसे सफ़ेद कफ़न पर लिटा दिए गए हो शव की भाँती और जलाने के लिए ले जाने के पहले लपेट लेंगे उन सबको इस कफ़न में. पर जब तुम्हारे मुह से सुनती हु तुम्हारा लिखा तो उन सभी शब्दों की आत्मा को महसूस कर सकती हु.” “ तुम्हे नहीं पता जब तुमने बारिश पर कविता कही थी तो मेरे मन की मिट्टी से सौंधी सौंधी सौंधी गंध उठने लगी थी और उसने मुझे भीतर तक महका दिया था”  “मै आश्चर्य चकित थी की मै मशीनी युग की लड़की जिसके मन में खेतो की उर्वरक मिट्टी नहीं थी बल्कि मरुभूमि थी. उस मरुभूमि को भी तुम्हारी बारिश की कविता ने उर्वरा कर दिया था.” उस मरुभूमि के भीतर गहरे दबे बीज में अंकुरण हो गया था और नागफनी के पौधों के संग उग आया एक प्रेम का पौधा जिसमे सपनो के फूल लगे थे और कही उन फूलो की पत्तियों में मुझे तुम्हारा नाम नजर आने लगा.”

Friday, April 12, 2013

झूठ

वो अक्सर मेरे छोटे छोटे झूठ पर हो जाती थी नाराज़ ,
"आज पूछती है कैसे हो ?"
समझ नहीं आ रहा उसे दुखी करू या नाराज़ .

Tuesday, December 11, 2012

तीसरी लड़की

वो टेबल पर रखे टिशु पेपर को एक टक देख रही थी . "अनन्या ,अनन्या कहाँ खो गई ?" मैंने उसे टोकते हुए पूछा . उसने बड़ी विवशता वाली दृष्टि से देखते हुए कहा " विशाल ये संभव नहीं है ""क्यों संभव नहीं है , समस्या क्या है ?" मुझे एक बड़ी कंपनी में जॉब मिल गया है और तुम्हे भी उसी शहर में इतना अच्छा जॉब मिल गया है . मै इसी दिन का तो इंतज़ार कर रहा था की तुम अपना सपना पूरा कर लो तो शादी की बात करें।"मैंने थोडा उत्तेजित होते हुए पुछा। अनन्या  ने धीरे से पानी का गिलास मेरी और सरकाते हुए कहा "विशाल हम आज यहाँ मेरी जॉब लगाने की ख़ुशी में पार्टी करने आए है न कि डेट पर।"उसने हँसाने की कोशिश करते हुए कहा। अनन्या  अक्सर गंभीर  मुद्दों को बदलने के लिए ऐसे ही बात बदल देती थी।पर आज उसे इस बात को बदलने में कुछ ज्यादा दिक्कत आ रही थी।"अनु बात मत बदलो तुम जानती हो ये मेरे लिए कितना महत्वपूर्ण है।"" और जो निर्णय लेना है वो मेरे लिए  जीने मरने जैसा है।" "विशाल तुम जैसे लडके को कोई भी अच्छी लड़की मिल जायेगी, मुझसे भी अच्छी।" मुझे कोई भी अच्छी लड़की नहीं चाहिए अनन्या ,मुझे सिर्फ और सिर्फ अनन्या त्रिपाठी से ही शादी करनी है। मेरा दिल जोरो से धड़क रहा था और कान भी शायद लाल हो गए थे, क्योंकि कान पर मुझे गर्मी का एहसास हो रहा था। "अनु ये अभिनय क्यों ?""मै नहीं जानता कि तुम इतना कठोर क्यों हो गई हो ?"लेकिन मेरे लिए यह डिस्टर्बिंग है , क्यों अनु क्यों?"" विशाल मैंने हमारी पहली मुलाकात में ही साफ़ कर दिया था की हम अच्छे दोस्त बनकर ही रहेंगे , सिर्फ अच्छे दोस्त उससे आगे नहीं।अब स्थिति सामान्य नहीं थी मैंने सोचा नहीं था की  अनन्या का ये रिएक्शन होगा। मेरे कहने के पहले हर बात को जान लेने वाली अनन्या आज बात को समझ नहीं रही थी।"इनफ अनु इनफ क्या हम अच्छे दोस्त ज़िन्दगी भर के लिए एक दुसरे के नहीं हो सकते ?""तुम जानती हो तुम मेरे लिए जीवन की ऊर्जा हो, लक्ष्य हो।" मेरे भीतर कुछ टूट सा रहा था और सबकुछ आउट ऑफ़ कण्ट्रोल हो रहा था। तुम  कहती हो कोई भी अच्छी लड़की मिल जायेगी यार अनु तुम मेरे लिए बेस्ट मैच हो।" "तुम विशिष्ट हो मेरे लिए ,तुम्हारी जगह कोई और ले नहीं सकता। कोई और लड़की मिल जायेगी यह कहना आसान है तुम्हारे लिए इसका मतलब समझती हो तुम?" अनजाने में मेरी आवाज़ काफी ऊची हो गई थी और अनु को ये अच्छा नहीं लग रहा था।
"समझती हु विशाल पर शायद तुम नहीं समझते की लड़की होना क्या होता है और वो भी तीसरी लड़की?" तीसरी लड़की इस संबोधन का प्रयोग आज तक अनु ने अपने लिए नहीं किया था। मै  जानता था की अनु की दो बड़ी बहने और एक छोटा भाई था।पर तीसरी लड़की इस संबोधन में बहुत कुछ छिपा हुआ था जो अनु के बोलने से परत दर परत खुलने लगा "मासी बताती है , माँ पेट से थी वसुंधरा दीदी और निष्ठां दीदी के बाद घर में तीसरे मेहमान के आने की तैयारी थी सभी लोगो को विश्वास था की इस बार नन्हा मेहमान लड़का ही होगा। पास के शिव मंदिर के पुजारी के कहने पर माँ ने सात सोमवार के व्रत भी किये थे।दादी ने माँ को जाने कितनी बार पूजा पाठ करते हुए कहा था " सुषमा अबकी बार निराश न करना , मुझे इस घर का कुलदीपक देखना है ताकि मै शान्ति से इस लोक से विदा ले सकू। "मासी बताती है की माँ को उस समय प्रसव पीड़ा कम और भय अधिक था की कही इस बार भी लड़की न हो जाए।दादी नन्हे कन्हेंया की आस में लगातार भजन कर रही थी "गोविन्द बोलो हरी गोपाल बोलो".नानी माँ को ढाढस बंधा रही थी "चिंता मत कर सुषमा अबके तो लड़का ही होगा मैंने सपने में  लड्डू गोपाल के दर्शन किये है।" सब विश्वास जाता रहे थे या कहना चहिये अपने भीतर के डर  को दबा रहे थे की लड़का ही होगा। और आखिरी घर में बच्चे के रोने की आवाज गूंज उठी। सभी लोग भय और उत्सुकता से  का इंतज़ार कर रहे थे। "दाई आकर बोली बधाई हो अम्मा जी घर में लक्ष्मी आई है।" दादी को काटो तो खून नहीं , इश्वर  से नाराज होकर दादी बोली है ठाकुर साब ये कैसा अन्याय है, मेरे बेटे के ऊपर ऊपर दो बोझ क्या कम थे जो तीसरी भी लड़की भेज दी। "
माँ ने होश आने पर मासी की तरफ प्रश्न भरी निगाह से देखा , मासी के उतरे  हुए चहरे और पानी भरी  आँखों  को देख कर माँ के  भी आंसू बह निकले। मासी ने माँ के माथे पर हाथ फेरते हुए कहा " निराश मत हो सुषमा "
मासी के स्पर्श ने माँ के भीतर का बाँध तोड़ दिया और माँ की आँखों से आंसुओ का सैलाब निकल पड़ा। मेरे जन्म ने माँ को कमजोर बना दिया था और एक गहरी उदासी उनके भीतर बैठ गई थी। जब मनुष्य अन्दर से दुखी हो तो लक्षण शरीर पर दिखने लगते है।
माँ की कमजोरी के कारण मेरी देखरेख का जिम्मा वसु दी के ऊपर आ गया था और सात साल की वो लड़की अचानक काफी बड़ी होकर मेरी जिम्मेदारी संभालने लगी। बच्चो  की देखरेख के संस्कार हम लडकियों को शायद जन्म से ही मिल जाते है। पिताजी को पोस्ट ऑफिस में बाबु बना दिया गया था और तनख्वाह में 500 रुपये की बढोतरी भी मिली थी। पिताजी मिठाई लेकर घर पहुचे और दादी के पैर छुते हुए बोले " अम्मा सचमुच हमारे घर में लक्ष्मी आई है , देखो इसके आने के बाद सरकार ने मुझे नौकरी में तरक्की और और तनख्वाह में बढोतरी दी है।" दादी खाट पर बैठे बैठे सुपारी काटते हुए बोली "गुड्डू ये पैसे संभाल कर रख , इस लक्ष्मी को विदा करने के लिए  देने पड़ेंगे। लड़की नाम पराया धन।" " इतना खुश मत हो गुड्डू।" "क्या अम्मा तुम भी इस बेचारी को कोसती रहती हो।" पिताजी ने दादी को समझाते हुए कहा। " अरे इसे कंहा कोसती हु, कोसती हु अपनी किस्मत को की ठाकुर जी ने पोते का मुह दिखाने के बदले भेज दी तीन तीन लडकिया। " एक लड़का भेज देते तो तुझे भी सहारा होता और बुडापे  की चिंता न होती।" पिताजी चुपचाप कंधे झुकाकर कमरे की और चल दिए।
धीरे धीरे हम तीनो बहने बड़ी होने लगी और हमारे बड़े होने के साथ साथ घर के खर्चे भी बड़े होने लगे। पिताजी की तनख्वाह से घर में मुश्कील से गुजारा होता था। वसु दी ने बच्चो को टूशन पढाना शुरू कर दिया और घर खर्च में मदद करने लगी।वसु दी ने आठवी की परीक्षा में जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया तो मास्टर जी खुद मिठाई लेकर घर आये। पिताजी  बाहर की बैठक में अखबार पढ़ रहे थे तभी मास्टर जी ने कहा " बधाई हो भाई साहब अपनी वसु ने हमारे विद्यालय और त्रिपाठी परिवार का नाम रोशन कर दिया . पूरे जिले में अव्वल आई है अपनी वसु।" पिताजी ने आभार प्रकट करते हुए कहा " सब आपके मार्गदर्शन का परिणाम है मास्टरजी।"      " नहीं भाई साहब ये तो वासु की इच्छाशक्ति और मेहनत है जिसने आज हमारा सर गर्व से ऊचा कर दिया है। पांच साल बाद हमारे शासकीय विद्यालय से कोई अव्वल आया है।" वसु दी ने मास्टरजी और पिताजी के पैर छुए और आशीर्वाद लिया। भाई साब अब वसु को नवी कक्षा के लिए प्रवेश चौक के स्कूल में करवा देना। " वहा  की पढ़ाई अपने गोविंदपुर के विद्यालय से अच्छी है।" यहाँ तो नवी की कक्षाए लगाती ही नहीं है , सिर्फ कन्या विद्यालय होने से एक तो बहुत सी लडकिया काम काज के चले आती नहीं है और जो थोड़ी बहुत आती है वो शिक्षिकाओं का निजी काम कराती रहती है।" " जी मास्टरजी लेकिन चौक का स्कूल तो वसु को काफी दूर पड़ेगा और वहा  की फीस"कहते कहते पिताजी  मज़बूरी के बादलो में गुम से हो गए।" भाई साब फीस की चिंता आप न करे, जिले में अव्वल आने वाले विद्यार्थी को चौक के स्कूल में शिक्षण शुल्क नहीं लगता और रही बात घर से दुरी की तो इस बार कलेक्टर मैडम ने 26 जनवरी के मीटिंग में कहा था मास्टरजी इस बार अगर कोई लड़की कन्या विद्यालय से मेरिट में आये तो उसे प्रोत्साहन के तौर  पर कोई इनाम जरुर देंगे। तो हम वसु  बिटिया के लिए कलेक्टर साहिबा से साइकिल की बात कर लेंगे। मास्टरजी  ने उत्साह के साथ अपनी बात खत्म करते हुए कहा। "मास्टरजी आपका बहुत आभार   होगा।" पिताजी ने दोनों हाथ जोड़कर मास्टरजी से कहा। मास्टरजी ने पिताजी के हाथ पकड़  कर कहा नहीं भाई साब ये तो इस बालिका की मेहनत  है।" " माँ सरस्वती  की कृपा है आपकी बिटिया पर।" इतना कह कर मास्टरजी चले गए।
शाम का समय था घर में  आज ख़ुशी का माहोल था। वसु दी के परीक्षा परिणाम की ख़ुशी में माँ आज खीर बना रही थी और उसमे डाली गई इलायची की खुशबू से सारा घर महक रहा था।  न जाने कितने सालो  बाद माँ खुश नज़र आ रही थी। पिताजी खाना खाते हुए माँ से बोले "वसु  की माँ अब हमारी वसु  बिटिया  चौक के स्कूल में पढ़ने जायेगी।""कलेक्टर  साहिबा ने साइकिल के लिए मास्टरजी को चेक भी दे दिया है।""वसु  दी हमारे गोविंदपुर से पहली लड़की होगी जो चौक के स्कूल में पढ़ने जायेगी।"निष्ठां दी चहकते हुए बोली। तभी दादी ने टेढ़ी भोए करते हुए कहा "गुड्डू जवान बेटी को छोरो (लड़को) के साथ पढ़ने भेजेगा कुछ ऊच नीच हो गई तो?" "अम्मा तुम भी न, कही कोई उच  नीच नहीं होगी, हमारी वसु सयानी है।" पहली बार पिताजी ने दादी की बात को सिरे से नाकारा था इससे अम्मा तिलमिला उठी और रसोईघर से बडबडाते हुए बाहर  निकल गई "लड़की की जात और ऊपर से छोरो का साथ भगवान बचाए।" काफी न नुकुर के बाद दादी ने वसु  को चौक के स्कूल में जाने   की इजाजत दी।
इसी साल हमारे घर में चौथे मेहमान के आने की तैयारी थी। दादी सुबह सुबह जल्दी उठकर रसोईघर में कुछ पका रही थी। देशी घी की फ़ैली हुए खुशबू बता रही थी की कुछ लज़ीज़ मीठा बन रहा है। माँ पीने का पानी भरकर लौटी तो दादी ने कहा "सुषमा थोडा सुस्ता ले बेटा  और ये बादाम का हलवा खा ले, तुझे ताकत की जरुरत है।"माँ दादी के हाथ से तश्तरी लेकर इधर उधर देखने लगी तो  दादी बोली" सुषमा ये तेरे लिए है तू खा ले, छोटी के लिए मैंने अलग से कटोरी में निकाल  कर रखा है।"दादी कटोरी लेकर मेरे पास आई और बोली अनु ए अनु क्या कर रही है?" और सर पर हाथ फेरते हुए मुझे गोदी  में बैठा कर बोली ये ले अनु बादाम का हलवा खा ले ." ये पहली बार था  जब दादी ने मुझे नाम से  पुकारा था।इससे पहले तो उनके मुह से हमेश छोटी या तीसरी ही सुनने  को मिलता  था। हलवा खिलाते हुए दादी बोली "अनु ठाकुर जी से प्रार्थना करना की मुझको जल्दी से एक भाई दे दो।" भगवान  बच्चो  की बात जल्दी मानते है शायद एसा सोचकर ही दादी मुझसे कह रही थी।
फरवरी की ठण्ड में हमारे यहाँ कुलदीप का जन्म हुआ। पोते को पाकर दादी के आँखों में चमक आ गयी थी और  एसा लगता था जैसे  जीने का कोई बहाना मिल गया हो।कुलदीप के जन्म  ने उनमे एक नवीन ऊर्जा भर दी थी।दादी अधिकतर समय कुलदीप की देखरेख में ही बिताती थी। इधर ये समय परीक्षा का था तो वसु दी के ऊपर पढ़ाई के साथ साथ घर संभालने की जिम्मेदारी बढ़ गई थी। निष्ठा दी जो कभी इधर का लौटा उधर उठा कर नहीं रखती थी ने वसु दी  का हाथ बटाना  शुरू कर दिया।निष्ठां दी के इस परिवर्तन को देख घर में सभी हैरान थे।दादी कुलदीप को एक पल के लिए अपनी आँखों से दूर नहीं होने देती थी। इच्छाए अगर देरी से पूरी होती हो तो आकर्षण अधिक समय तक बना रहता है।
एक साल बाद माँ कुलदीप को लेकर नानी के यहाँ मकर संक्रांति  मनाने के लिए गई थी। यह पहला मौका था जब दादी कुलदीप से दूर हुई थी। इस विरह ने दादी को ज्वर  की चपेट में ला दिया। बुखार ऐसा चढ़ा की तीन दिन तक उतरने का नाम ही नहीं लिया चौथे दिन दादी को थोड़ी राहत हुई। दादी फिर भी दर्द से कराह रही थी। मै  दादी  के पास बैठ उनके पैर दबा रही थी। तभी दादी बोली "अनु बस कर बेटा  थक गई होगी" दादी के मुह से इतने प्यार के साथ बेटा  सुनकर मेरा मन भर आया और मै  दादी से गले लग कर जोर से रोने लगी। दादी की भी आँख भर आई और वो बोली छोटी रोती क्यों है?"मैं नहीं मरने वाली इतनी जल्दी, कुलदीप का ब्याह करके ही जाउंगी में इस संसार से।"निष्ठां दीदी जो दादी की दवाई  और पानी लेकर आई थी तुनक कर बोली " जो यहाँ बैठ कर इतनी सेवा कर रहा है उसकी कोई इज्जत नहीं और जो एक साल का भी नहीं हुआ है  उसकी शादी के सपने देखे जा रहे है।" निष्ठां दी और दादी के मध्य शब्दों का शीत युद्ध चलता रहता था। " तू नहीं समझेगी निष्ठां , लडकियों से आस नहीं लगाते  वो पराया धन होती है।" यह सुनकर निष्ठां दी भड़क गई और बोली " अम्मा लड़की होना पाप है क्या जो उसके अपने भी उसे पराया धन कहते है और दुसरे घर का पता नहीं वह प्यार मिले न मिले।" निष्ठां दी का गुस्सा उनकी आँखों से आंसू बन बह निकला। दादी कुछ देर चुप रही और फिर बोली "निष्ठां आ इधर बैठ और सुन हम तीन बहने थी, अनीता जीजी सबसे बड़ी, कामना जीजी दुसरे नंबर की और में तीसरी।दादी का स्वर धीमा और गभीर हो गया और आँखे अतीत में झाकने लगी। " बेटा  न होने पर माँ को घर में और समाज में हमेशा तिरस्कृत होना पड़ा और वो मन ही मन घुटती रहती। निष्ठा  दी आंसू पोंछकर दादी की बात ध्यान से सुनने  लगी। अनीता जीजी का रिश्ता बड़े घर में तय हुआ था पिताजी ने शादी में हैसियत से ज्यादा खर्च किया था और दहेज़  के लिए पुरानी कोठी गिरवी रख दी थी। जीजी की शादी के बाद उनके ससुराल वालो की  मांग बढ़ती  गई और एक दिन जीजी  ने विवश होकर जहर पी लिया। शायद वो पिताजी की इतनी ही मदद  कर सकती थी। अनीता जीजी की आत्महत्या और पिताजी की बिगड़ी माली हालत के कारण कामना जीजी के लिए अच्छा रिश्ता ढूंढ़  पाना मुश्किल हो गया था। बड़ी मुश्किल से गाँव के एक पुजारी के  यहाँ रिश्ता पक्का हुआ। लड़का पंडिताई भी करता था और भेंसो का व्यापार  भी करता था। कामना जीजी बारहवी  पास थी उनके हिसाब से ये रिश्ता बिलकुल उपयुक्त नहीं था पर पिताजी को मजबूर देख कर उन्होंने शादी के लिए हां कर दी। शादी के बाद कामना जीजी ऐसी गई की आज तक  मायके  का मुह भी नहीं देखा। वो  पिताजी से ज्यादा नाराज थी या खुद के लड़की होने पर नाराज  थी मैं आज भी यह जान नहीं पाई।
इधर माँ की तबियत  बिगड़ गई और वो परलोक सिधार गई। मैं जो तीसरी लड़की थी पिताजी के लिए भोझ सा बन गई। दिन रात उन्हें मेरी शादी की चिंता सताती रहती। एक दिन तुम्हारे दादाजी कचहरी के कुछ काम से आये और पिताजी के मन को भा गए। तेरह साल की उम्र में ही मेरा ब्याह कर दिया गया औत पिताजी स्वर्ग सिधार गए। शायद मेरे ब्याह की चिंता से उनके प्राण उस जर्जर हुए शरीर में टिके हुए थे। कहते कहते दादी का गला भर आया और वो बोली " इसलिए मेरी बच्चियों मुझे लड़की होने का एहसास है।" "दुनिया  ऊपर से चाहे कितनी भी बदल जाए पर लडकियों के लिए इसका रवेया कभी नहीं बदला है।"कहते कहते उनकी आँखों से आंसू छलक पड़े मैंने पहली बार दादी को रोते देखा था। मैं और निष्ठां दीदी भी उनके  गले लग कर रोने लगे। निष्ठा दी के मन में जो दादी के लिए गुस्सा था वो सब आज आंसुओ से धुल गया था।"
इतना  कह कर अनन्या रुक गई वो खुद नहीं जानती थी की यह कहानी सुनाते  सुनाते वो तीन बार रो चुकी है। जैसे ही उसे उसकी आँखे भीगी होने का एहसास हुआ , उसने झट से आंसू पोंछ दिए और बोली" विशाल तुम नहीं समझ पाओगे की लड़की होना क्या है?" जन्म से ही हमारे ऊपर मर्यादा  और समझोते की विवशता लाद दी जाती है।" " फिर भी लडकियाँ  हसते हसते कभी माँ बन, कभी पत्नी बन, कभी बेटी बन समझोते करते करते जिंदगी जीते चली जाती है।" तुम कभी नहीं समझ सकोगे विशाल  की लड़की होना क्या है।" इतना कहकर अनन्या रेस्टोरेंट से बाहर चली गई और मै  बैठे बैठे सोच रहा था की वह सही कह रही है हम पुरुष कभी समझ नहीं पायेंगे की लड़की होने क्या है।
आज चार साल बाद मेरे घर में एक लड़की का जन्म हुआ है और इसका नाम मैंने अनन्या ही रखा है। उस अनन्या से तो उस दिन के बाद मिलने  की हिम्मत न कर सका पर इस अनन्या को बिना समझोते वाला जीवन देने का वचन देता हु।







 






Saturday, September 15, 2012

बर्फी

रणबीर कपूर का सशक्त अभिनय और अनुराग  के अभिनव प्रयोग से सजी शानदार फिल्म "बर्फी"..देखकर अभिभूत हो गए और एक पंक्ति आप सब के लिए " प्यार ज़िन्दगी में एक बार आपके दरवाजे पर दस्तक जरूर देता है लेकिन अगर आपने देर कर दी तो फिर ज़िन्दगी भर आप उस दस्तक के एहसास के सहारे जीते है . ज़िन्दगी में rewind का button नहीं है दोस्तों। जो है आज है उसे जी लो  कल का पता नहीं तो जो आपके करीब है या जिनके आप करीब है उन्हें दूर न जाने दे।" बर्फी की  टीम को बधाई। 

Friday, September 7, 2012

कोशिश

ख्वाबो की तरकारी लेकर ,  कोशिशो का छोंक लगाए .
मेहनत की आंच दे, सच्चाई का रंग ले आए . 

Saturday, May 26, 2012

वक़्त रेत  ही तो है अक्सर फीसल  जाता है हाथों से ,
लेकिन  मैंने बंद  कर  लिया है उन  लम्हों  को  एक  रेत  घडी  में ,
तुम्हारी  याद आने  पर पलट देता हु  उस  घडी को  अक्सर .  

Wednesday, March 28, 2012

हिसाब किताब

मेरी दुआ है ऊपर वाले से , दे तुम्हे एक गुदगुदी जो ले आए होठो पर तुम्हारे हँसी, जो शायद खो गयी है भीड़ में कही. दे चाँद की रोशनी तुम्हारी आँखों में जिनसे वो चमक उठे और देखने लगो तुम सपने नए फिर से. कोई गीत गुनगुना दे तुम्हारे कानो में जिससे झूम उठे दिल तुम्हारा. छीन  ले तुमसे तुम्हारी स्मिरीती जो अतीत के पलो को खीच लाती है वर्तमान में जिनसे तुम दुखी हो जाते हो . और आखिरी में भर दे सुकून से तुम्हारा दिल ताकि सो सको तुम चैन से बिना हिसाब किताब किये की क्या खोया क्या पाया.


किसी अपने के लिए जो जिंदगी से उदास है
और ऊपर वाले से नाराज़ है . 

Wednesday, January 25, 2012

गणतंत्र दिवस की बधाई

आप सभी को गणतंत्र दिवस की बधाई .....भाई १५ अगस्त २६ जनवरी और क्रिकेट मैच इसी दिन हमारा देशप्रेम कुछ ज्यादा परवान चढ़ता है . भारतवासी होने के नाते सविंधान ने मुझे भी स्वतंत्रता दे रखी है अपने विचार व्यक्त करने के लिए तो भैया हम हो गए शुरू ......वैसे किसी ने सही लिखा है कि "कुछ तो बात है हम में कि हस्ती मिटती नहीं हमारी "  कुछ तो बात है कि भ्रष्टाचार के नए नए रिकॉर्ड बनाने वाले लोग आज भी अपनी कुर्सी पर बैठे बैठे मुस्कुरा रहे है और हमारे देश कि अस्सी प्रतिशत आम जनता किसी अवतार के अवतरण के इंतज़ार मई आस लगाए हुए है .  कभी कभी कोई क्रांतिकारी विचार जुगनू कि भाँती चमक उठता है और हम उसे सूरज समझ लेते है  और खुश हो जाते है कि अब सवेरा होने को है . पर जुगनू कि तरह ही वो रोशनी भी लुप्त हो जाती है . कोई भ्रष्टाचार के बड़े बड़े आंकड़े के मुद्दे उठाता है और हम खुश हो जाते है अब तो परिवर्तन आएगा पर  समय के चक्के में वो मुद्दा भी धुल कि तरह उड़ जाता है . पहले लोग आंकड़े भूलते है , जो कि अरबो करोडो में होते है  फिर मुद्दे . अब क्या करे भैया उन्हें भी तो बाल बच्चे पालने है और अगर वो भी इन बातो में अटक कर रह गए तो फिर देश का सकल घरेलु उत्पाद का क्या होगा जिसे बढाने के लिए ये अस्सी प्रतिशत लोग दिन रात मेहनत करते है. मुझे तो इतने अरबो रुपये कि संपत्ति और घोटालो कि बात सुनकर या पढ़ कर बड़ी ख़ुशी होती है भाई आखिर हमारे देश में इतना  पैसा तो है ...अब ये बात अलग है कि इसी देश में लोग भूख से मर जाते है. ये तो हुए अस्सी प्रतिशत जनता की बात बाकी बचे २० में से १० प्रतिशत वो जो बोलने में कम करने में ज्यादा विश्वास रखते है और अपने तरीके से विरोध प्रदर्शन करते है.बचे १० में से ५ प्रतिशत हम जैसे लोग जो खुद तो कुछ नहीं करते बस राख में से अंगारे ढूँढते रहते है  और आखिर के ५ प्रतिशत वो जिनके तो मजे है वो जिनके महलों में कभी अँधेरा नहीं होता क्योकि उजाले पर उन्होंने हक जमा रखा है . जिनके होठो पर भूख , गरीबी जैसे शब्द तो होते है पर उनका अर्थ या मर्म समझने का दिल नहीं , जो आज झंडा वंदन कर जन गण मन गायेंगे तो जरुर पर निभायेंगे नहीं ..........चलिए हम भी गणतंत्र दिवस मानते है भाई सरकार ने एक दिन की छुट्टी जो दे रखी है......और अंत में अगर आपको बात कड़वी लगी है तो आपके लिए है बूंदी के लड्डू जो जन गण मन के बाद बटने वाले है. 

Sunday, December 18, 2011

उसका नाम मद्रास क्यों है?

अक्सर गेहू पिसवाने की दूकान (आटा चक्की ) पर वो सावला दुबला पतला सा लड़का मुझे दिख जाता था. मेहनत करते हुए कभी अनाज की बोरिया उठाते हुए तो कभी आटा चक्की से आटा निकालते हुए . आटा चक्की वाले  काका  उसे  आवाज  लगते  "ऐ मद्रास जल्दी कर " मद्रास उसका ये नाम मेरे लिए आश्चर्य का विषय था . एक दिन मैंने हिम्मत कर के उससे पूछ ही लिया " छोटू तुम्हारा नाम क्या है ?" उसने प्रश्नभरी निगाह से देखते हुए उत्तर दिया "मद्रास". मैंने प्यार से फिर पुछा छोटू तुम्हारा असली नाम क्या है ?" उसने वही उत्तर थोड़ी उदासी के साथ दिया "मद्रास". मद्रास ये कैसा नाम रखा भाई तुम्हारे मम्मी पापा ने? उसने रुआंसी आँखों से मेरी तरफ देखा और बोला भैया ये नाम मेरे माँ बाप ने नहीं रखा है ये नाम मुझे बाजार ने दिया है , जिनके माँ बाप नहीं होते है न भैया दुनिया उन्हें ऐसे ही नाम दे देती है . और एक  बड़ा भारी बोरा वो सर पर उठा कर चल दिया........

Wednesday, November 16, 2011

उन्मुक्त

अल्फाजो से एहसासों को बया कर  पाना अब मुश्किल है
दुनियादारी में खुद को उलझा पाना अब मुश्किल है
इस पीर का मजा एक पीर ही जाने
रोशनी को अंधेरो से दबा पाना अब मुश्किल है

Thursday, July 21, 2011

मुझे भूल न जाना

उसने पके बालो को कानो के पीछे करते हुए पूछा
"क्या आज भी मुझे याद करते हो ?
मैंने झट कुर्ते कि जेब से एक डिबिया निकाल कर उड़ेल
दी उसके सामने। जिसमे थे कुछ कांच कि चूड़ियों के टुकड़े , एक नीली बिन्दी और
कागज़ की परची जिस पर लिखा था
"मुझे भूल न जाना ।"

Wednesday, June 15, 2011

तन्हा

सिलसिले कुछ इस तरह लगे है तनहाईयों के
कि आएने में जो शख्स दिखता है उसे भी पहचान नहीं पाते है अब तो .

Tuesday, November 30, 2010

शौक

जानता हु महफुज है साहिल पर ज़िन्दगी , पर मुझे तो शौक है लहरो पर सवार होने का ।

Thursday, September 30, 2010

खलिश

खलिश इस बात कि नहीं कि उसे ज़िन्दगी में नहीं पाया ,
कसक इस बात कि है वो कुछ लम्हों के लिए ज़िन्दगी में क्यों आया ?